एक आध्यात्मिक गुरु का अलौकिक ज्ञान [Ek Adhyatmik guru ka Alaukik Gnan] (Hindi eBook)

लोगों के जीवन में अक्सर एक पल आता है जब पूर्ण विराम गायब हो जाते हैं। प्रश्न चिह्न उठ खडे होते हैं। विराम-चिह्नों का सिलसिला शुरू होता है। अँगडाई लेते हुए अंतहीन, अथाह विराम चिह्न…। यही वह वक्त होता है जब एक व्यक्ति एक जिज्ञासु बन जाता है। यह पुस्तक जिज्ञासुओं के लिए, अन्वेषकों के लिए है। यह विकल, व्यग्र और विवह्ल कर देने वाले प्रश्नों के सरगम का एक संकलन है, जो हरेक जिज्ञासु के मन में कभी न कभी जरूर उठते हैं। प्रश्न अनेक विषय वस्तुओं से संबंधित हैं – भय, कामना, कष्ट और पीडा, निष्ठा, स्वतंत्र इच्छा शक्ति, नियतिवाद, ईश्वर, विश्वास, प्रेम, नैतिकता, आत्म-वंचना, असमंजस, कर्म, आध्यात्मिक-मार्ग, मन, शरीर, रोग, आरोग्यता, पागलपन, मृत्यु, विसर्जन। प्रश्न और भी हैं।

उत्तर सद्गुरु जग्गी वासुदेव के द्वारा दिए गए हैं जो कि हमारे समय के एक बुद्ध-पुरुष और दिव्यदर्शी हैं। अविचल, अपने आंतरिक अनुभव में आरूढ, ये किसी संगठित धार्मिक, साम्प्रदायिक या सिद्धांतवादी परम्परा से संबंध नहीं रखते। बिल्कुल स्पष्ट, हास्यपूर्ण, अपरंपरागत, उकसानेवाले लेकिन असीम करुणा से परिपूर्ण, उनके ये उत्तर अंतरंग शिष्यों के बीच, दस वर्षों से भी अधिक समयांतराल में, विभिन्न अवसरों पर मुखरित हुए थे। उन्होंने विविध विषयों पर अपनी अंतरदृष्टि और ज्ञान बाँटा है, जिन पर किसी सार्वजनिक सभा में वे शायद ही कभी चर्चा करते हैं। उनके ये शब्द उन थोडे से लोगों में – जिन्हें एक लंबे समय से उनके सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त रहा है – विकास को पोषित करने हेतु संप्रेषित किए गए थे। आत्मीय स्वर, तालबद्ध वार्तालाप, तथा विशिष्ट प्रसंग – यही इस पुस्तक की विशिष्टता है। प्रत्येक संस्कृति और संप्रदाय के जिज्ञासु, बिल्कुल प्रथम पृष्ठ से ही स्वयं को एक तटस्थ श्रोता से संवाद में एक सहभागी बनता हुआ महसूस करेंगे। उत्तर स्वयं में एक असंदिग्ध प्रामाणिकता की झंकार, एक गहरी स्पष्टता और उनके ज्ञान को धारण किए हुए हैं, जो यह जानते हैं कि खोजने का अर्थ क्या होता है। और जानना क्या होता है। और कैसे इन दोनों के बीच की एक दुःसाध्य और प्रायः छोर-रहित यात्रा को नियोजित और सुगम बनाया जाए।