दिव्‍यदर्शी की आँखन देखी [Divyadarshi ki Ankhan Dekhi] (Hindi eBook)

यह पुस्तक प्यासों के लिए है। और निश्‍चित रूप से यह पुस्तक कायरों के लिए नहीं है। हमारे समय के एक जीवंत गुरु और दिव्यदर्शी, सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने एक गहन तथा व्यापक संवाद की शृंखला में उन सभी गूढ़ प्रश्‍नों को संबोधित किया है जिनकी कल्पना कोई जिज्ञासु कर सकता है। प्रश्‍न आत्मज्ञान, मुक्ति, मृत्यु, ईश्‍वर और पुनर्जन्म से संबंधित हैं। साथ ही वे भी प्रश्‍न हैं जो दिखते तो बड़े मामूली हैं, लेकिन सबको आतंकित करते हैं तथा जिनको जानने की उत्सुकता सब में होती हैं, परंतु पूछने में लोग झिझकते हैं: ये भूत-प्रेत, भटकती आत्माएँ, जादू-टोना, कायाहीन प्राणी, फरिश्‍ते, दानव, गुह्य विद्या इत्यादि से संबंधित हैं। जब सद्गुरु तीन जीवन कालों की अपनी असाधारण प्रतिबद्धता व दुःसाहस और अपने जीवन के एकमात्र ध्येय की ऐतिहासिक गाथा को उजागर करते हैं तब यह पुस्तक अपने विषय-वस्तु की चरम सीमा को छूती है। उनकी इस दुःसाहसी यात्रा का परिणाम है ध्यानलिंग, जो सदियों से असंख्य योगियों का स्वप्न रहा है। ध्यानलिंग ऊर्जा का एक अनूठा रूप है, जो अपने दायरे में आने वाले हर एक व्यक्ति में मुक्ति का बीजारोपण करता है।

यह पुस्तक सँजोने के लिए है। यह ज्ञान के एक जीते-जागते दिव्यदर्शी की, एक विलक्षण विद्या-निधि की, एक आधुनिक दिव्यदर्शी के लोक की अपूर्व झलक प्रदान करती है। यद्यपि अपनी चर्चा के दौरान सद्गुरु अतर्क के सुदूर छोर को छूते है, तथापि अपनी प्रज्ञापूर्ण, विशुद्ध वाकशैली के कारण अत्यंत काल्पनिक विषयों पर बोलते हुए भी वे कभी अपनी प्रामाणिकता नहीं खोते। इसका परिणाम है एक अनोखा नज़रिया – उस जगत के प्रति जिससे आप परिचित हैं, या कम से कम आप सोचते हैं कि आप परिचित हैं! दिव्यदर्शी की आँखों से – अद्भुत, अतुल्य अंतर्दृष्टि और तीक्ष्ण स्पष्टता के दिव्य चक्षु से – जगत रूपांतरित होता है। एक ऐसा जगत जो आपको स्मरण दिलाता है कि ‘इस पृथ्वी पर, औैर स्वर्ग में भी, आपकी कल्पना से परे, आपके विचारों से परे, बेशुमार, ढेरों… चीजें हैं।’